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क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।
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आज 29 जुलाई 2016 को महात्मा गाँधी, श्रीदेव सुमन, पं श्रीराम शर्मा, गौरा देवी जैसे अनेक महापुरुषों को एक शरीर में जीवंत रूप में देखने का सौभाग्य मिला। 89 वर्षीय पर्यावरण गाँधी, पद्म विभूषण श्री सुन्दरलाल बहुगुणा जी ,जो चिपको आंदोलन के सूत्रधार रहे ,के दर्शन का दिव्य अवसर मिला। थोड़ी देर की बात चित में उन्होंने उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में पानी, जवानी और पर्यावरण से सम्बंधित समस्याओं को सूत्र रूप में बताया। अपनी जवानी के दिनों को याद करते हुए उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में मीलो की जागरूकता यात्रा का जिक्र किया। जो आज गांव छोड़ रहे युवाओं को प्रेरणा देने का काम कर सकता हैं।
उनके शब्दों में-“अंग्रेजों ने पैसा कमाने के लिए पहाड़ में चीड़ भर दिए। जिसने मिट्टी को एसिडिक(जहरीली) कर दिया और उसकेे कारण लगातार पहाड़ो में पानी के स्त्रोत सूख रहे है। आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। जीवन जीने का साधन पानी और मिट्टी ख़त्म हो रही है। राज्य में जहाँ घाटियों में थोड़ा समतल ज़मीन थी, वह बाँध बनाकर नष्ट कर दी गयी हैं। इन सब वजहों से यहां का युवा पहाड़ छोड़ के बाहर जा रहा हैं।यह देश के लिए अच्छा नहीं है, युवा नही टिकेगा तो चीन उस क्षेत्र में हमला करने का साहस करेगा। डिफेंस की दृष्टि से नवयुवकों का पहाड़ छोड़कर जाना ख़तरनाक हैं। यहाँ की इकॉनमी मनीआर्डर इकॉनमी है,जिसे बदलने की जरूरत है।
पहाड़ का विकास बहुत आसान है। जिसके लिए मेरे दो सूत्र है.. चीड़ को हटाओं.. नीचे बहते पानी को खिंच कर पहाड़ की चोटी तक लाओ। यह युवाओं के लिए चुनौती हैं। यह दुर्भाग्य ही हैं कि आजादी के बाद भी सरकारें उत्तराखंड का लैंड सिस्टम नहीं बदल पायी। आज सरकारों के आदमी देहरादून से ऊपर जाना ही नहीं चाहते। अगर जाएंगे नही तो पहाड़ को कैसे जानेंगे। आज जरूरत है पहाड़ के प्राकतिक सौंदर्य को बहाल किया जाय। सैलानी आये और इस दिव्य निर्माण का सुन्दर एहसास कर सकें।”
10मिनट की बात चित में वे अपने बिगड़े स्वास्थ्य से इतर एक युवा की भांति, जोश और उम्मीद के साथ बोले। जो हर युवा के लिए प्रेरणादायी होगा
आभार- मुकेश बोरा

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शोध यात्रा में आज का दिन(18 जुलाई) सबसे विशेष रहा। झमाझम बरसात के बाद, सुबह 9 बजे पौड़ी से लगभग 120 किमी दूर उपरेखाल पंहुचा। बैजोव, उपरेखाल से 25 किमी पहले, से आगे आते ही माहौल में त्वरित परिवर्तन महसूस हुआ। चारों ओर खूबसूरत फसलों से लहलहाते सीढ़ीदार खेत, बाँज,उतीश के पेड़ों से भरी घाटी, खेतों में काम करते लोग। ये सब देख के लगा,मानों भगवान ने कुम्हार की तरह खुद अपने हाथों से इसे तराशा हो लेकिन यह एक इंसान का लोगों के सहयोग से वर्षों की मेहनत का फ़ल हैं। कुछ दूर चलने के बाद वो प्रकृति का कुम्हार, जंगलों को बनाने वाले, पानी पैदा करने वाले श्री सचिदानंद भारती जी मिले। जितने महान काम, उतने सरल इंसान।
आज सारा दिन उनके साथ बिताया, आसपास के जंगलों में घुमा, ताल-खाल के प्रयोग देखें, गाड-गंगा नदी को देखा, उनकी कहानी जानने की कोशिश की। इतना सब देखकर लगा कि एक इंसान क्या क्या कर सकता हैं?और अगर वो ठान ले तो सब कुछ कर सकता हैं।
20 year, 30000 taal-khal,connected 150 villages of pauri,chamoli,almora district,
, recharge Daard Ganga river and many more.
…भारती जी की शेष बातें थीसिस में।
…मुकेश बोरा।

हालात !
अंदर से कुछ और,
बाहर बस मजबूरी है।
इतना विशाल समंदर,
लेकिन सब खारा पानी है।
चाहत चांद तक उड़ने की,
इतंजार अंधेरे का अब भी है।
हर कोई भाग रहा यहां,
अभी भी असल काम बाकी है।
दिल बहुत है मगर,
धड़कन से बेखबर है।
मैनें पन्नें पर लफ्ज लिख दिए,
लेकिन जिन्दगी का गीत अभी बाकी है।
आज फिर मन ने कुछ कहां,
पर ये शोर अभी भी जारी है।
हालात इस कदर हावी है,
ैकि अब भी मौत इतंजार में है।

आए थे यहां

एक ईट बनकर, 

आज इतने बडे  महल का हिस्‍सा हैं । 

गर्व होता हैं ।।

 

नन्‍हा पौधा सा 

हमारा शरीर (ज्ञान) था, 

आज एक विशाल बरगद का पेड हैं । 

गर्व होता हैं ।। 

जीवन की खिडकी 

अदखुली सी थी ,

आज सामने सारा आसमान नजर आता हैं ।

गर्व होता हैं ।।

लक्ष्‍य धुंधला सा था 

थोडा स्‍पष्‍ट -ज्‍यादा अस्‍पष्‍ट, 

आज तो प्रकाश का अंतिम बिन्‍दु दिखता हैं ा

गर्व होता हैं ।।

कदम कांपते थे 

कुछ दूर चलने पर गिर पडता थे,

आज मजबूत हूं मीलों चलने के लिए । 

गर्व होता हैं।। 

क्‍या सही-क्‍या गलत 

भटकाव, असमंजस में रहता था, 

अब विवेक जाग गया हैं । 

गर्व होता हैं ।। 

जब आसमान से मौत बरस रही थी तब सैनिक जिन्दगी बनकर सामने आए. ये कहना है एक पर्यटक का जो हिमालय सुनामी का गवाह बना था. यह बात शत प्रतिशत सही है कि जब भी कोई आपदा आयी है चाहे वो भूकंप हो या अकस्मात किसी क्षेत्र में आग लग जाना और या फिर कामनवेल्थ गेम्स के पहले बना पुल गिर जाना. हर दुःख की घड़ी में साहस और बहादुरी का परिचय देते हुए हमारे सैनिकों ने पूरी ईमानदारी के साथ काम किया. उत्तराखण्ड़ क्षेत्र के में आए जल प्रलय के बाद जवानों के योगदान ने एक बार फिर यह बात साबित कर दी.
पहाड़ो के कठोर रास्ते, तेज बहती नदियां, मौसम के लगातर बदलते तेवर इस सब कठिनाईयों के बीच भी सेना के जवानों ने हिम्मत का परिचय दिया. एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसान जवानों ने अपने पेट का निवाला दूसरों को दिया और भूखे, प्यासे ही राहत कार्य में जुटे रहे. जब एक पुल पर रखने के लिए फट्टे नहीं मिलें तो सेना के जवान खुद ही उन रस्सियों में लेट गए और अपने शरीर से पुल बनाकर बाढ़ में फसें लोगों को निकाला. मानवता के प्रति सैनिकों इस प्यार को देखकर हमारा हृदय उनके प्रति और अधिक सम्मान से भर जाता है और इसलिए ही हर भारतीय का हाथ उन्हे देखते ही स्वतः ही सलाम करने के लिए उठा जाता है.
एयरफोर्स का अतिविशिष्ट एमआई 17 हेलीकाप्टर, जो राशिया से लाया गया था और पिछले साल ही सेना में शमिल किया गया था, आपरेशन राहत के दौरान गोविन्दघाट के पास दुघटनाग्रस्त हो गया. उसमें बैठे सारे 20 के 20 वीर शहीद हो गये. खराब मौसम के बाबजूद भी फंसे लोगों को बचाने की चाहत के कारण उन्हे अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. घटना के बाद ये बाद भी सामने आयी कि पायलटों को उड़ान भरने का दबाब था अगर ये बात सच है तो काफी शर्मनाक है. ऐसी डरावनी घटना के बाद लगा था कि राहत कार्य हल्का पड़ जायेगा, लेकिन एयरफोर्स के अधिकारी के बयान कि हम राहत कार्य समाप्त होने के बाद ही आराम करेगे, ने नया जोश और उत्साह भर दिया और एक बार फिर दिखा दिया की कर्तव्य सबसे बड़ा होता है. वास्तव में उनकी निस्वार्थ त्याग की भावना किसी तीर्थयात्रा से कही ज्यादा विशिष्ट है.
हार मान चुके लोगोें को बचाना सबसे कठिन होता है, हमारे वीर जवानों ने उन्हे बचाया ही नहीं बल्कि उनका हौसला भी दिया ताकि वे लोग अपनी बची जिन्दगी को शान से जी सके. हजारों लोग जो आज जीवित है और अपने घर लौट चुके है हर कोई यही बात दोहरा रहा है कि एक जीवन तो भगवान ने दिया था, ये दूसरा जीवन है जो हमें सेना की खातिर मिला है. वे हमारे लिए सदा ही भगवान के समान रहेंगे, कई लोगों ने प्रभावित होकर यहां तब कह डाला कि वे अपने बच्चों को सेना में ही भेजेंगे. ये सारी बातें उनके द्वारा की गए सेवा कार्य की महानता को दर्शाते है. सेना के जवानों ने लेागों की तो जान बचायी ही साथ में उन्होने पहाड़ी क्षेत्र में फसे मवेशियों को बचाने, उन्हे चारा पहुचाने में विशेष योगदान दिया. जो उनकी कर्मठता और कर्तव्य के प्रति दृढ़ इच्छाशक्ति को बतलाता है.
हमारी सेना जिसमें विशेषकर हिमालय क्षेत्र में कार्यरत थलसेना, आईटीबीपी, एयरफोर्स, एनडीआरएफ ने लगातार राहत कार्य में लगे रहना इतिहास हमेशा याद रखेगा. वे बिना किसी भेदभाव के मानवता की दृष्टि से हर किसी की सहायता कर रहे है. लड़ाई में तो अक्सर मारना ही होता है पर यहां दूसरे प्रकार की लड़ाई थी जहां लोगों की जान बचानी है. इस दूसरे प्रकार के युद्ध में सेना ने बड़ी जिम्मेदारी के साथ काम को अंजाम दिया. इतनी जटिलताओं के बीच न उन्हंे ज्यादा मीडिया कबरेज मिला और न ही बाद में वे किसी विशिष्ट पदक से नवाजे जायेगे, यहां तक की उनका नाम भी किसी को पता नहीं चल पायेगा. बावजूद इस सब बातों के फिर भी बिना किसी लालच के अपना काम कर रहे है और करते रहेगे. इन बातों से कम से कम हमारे नेताओं को तो सीखना चाहिए जो इस विकट आपदा के समय अवसरवादी राजनीति का गंदा खेल खेल रहे है और अपने कर्तव्यों से बिल्कुल अनभिज्ञ है.
आज हमारे समाज में हर कोई अधिकारों के लिए चिल्लाते रहता है लेकिन जब भी कर्तव्यों की बात आती है तो चुप हो जाता है या उनकी परवाह ही नहीं करता. यही कारण है कि आज हम प्राकृतिक घटनाएं आपदा बनती जा रही हैै और हाल की आपदा में जो भारी जन धन की हानि हुई उससे हमारा प्यारा पहाड़ विकास के दौर में कई साल पीछे चला गया. यह सब हुआ सिर्फ हमारे कर्तव्यों से मुह मोड़ लेने से. आज की विकट समय में अगर सेना का जवान अपने कर्तव्य यानी बचाव अभियान में थोड़ा सा भी कोताही बरतता तो पता नहीं कितने लोग और जान से हाथ धो बैठते. यहां पर हमें कर्तव्यों की महत्ता का अंदाजा लगा होगा. अगर हमने पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्यों को समझा होता तो पहाड़ों में शहरीकरण, खनन, पेड़ को कटने का प्रतिशत कुछ ही सालों में इतना न बड़ गया होता और ऐसी आपदा न आयी होती.
सेना ने अपने प्रयासों से हमारे लोगों की जान बचाकर हमें मौका दिया है की हम अपने कर्तव्यों को समझे, अपनी समाज के प्रति जिम्मेदारी को जाने. हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम खुद पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुचायेगे और संरक्षण के लिए प्रयास करते रहेगे. खुद से शुरू की गयी मुहिम को दूसरों को बतायेगे और समाज में फिर ऐसा आपदा न आए इसके लिए प्रयास करेगें. वास्तव में यही हमारे वीर जवानों को सच्चे अर्थों में उनकी मेहनत के बदले का धन्यवाद होगा.

           आज सोशल मीडिया लोगों से काफी करीब है. हर कोई इस नवीन विधा में रूचि लेने लगा है, और कही न कही यह हमारे रोजमर्रा के जीवन का अंग बन गया है. टाइम-पास से लेकर ज्ञान वृद्धि का एक अच्छा माध्यम बनकर इसने अपनी उपयोगिता को सिद्ध किया है. यह हमारे अकेलेपन का साथी बना है लेकिन बाबजूद इतनी सारी खूबियों के इसने हमंे खुद से काफी दूर कर दिया है यानी हम खुद से बातें नहीं कर रहे है, जो आत्मनिरिक्षण का एक तरीका है, दिल की नहीं सुनते और यहा तक कि हम भावनाओं की कद्र करना भी भूल रहे है. इन सभी बातों की प्रमाणिकता हमें खुद अपने आस पास देखने से मिल जायेगी.
बस, मेट्रो, हर कही जहां पर कोई विशेष कार्य न हो और कभी कभी आफिस में काम के वक्त, क्लास में टीचर के होने पर भी चुपके से इसका मजा ले ही लिया जाता है। कहने का मकसद यह है कि इसका प्रयोग शुरू हुआ था खाली समय के मनोरंजन से और आज यह आदत बनता जा रहा है. जो कही मीठा तो कही कड़वा असर छोड़ रहा है.
इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएसन आफं इण्डिया की रिपोर्ट के आधार पर शहरी भारत में सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की संख्या 2012 दिसम्बर में 6.2 करोड़ तक पहुत गई है यानि प्रत्येक चार में से तीन व्यक्ति इसका इस्तेमाल कर रहे है लगभग 74 प्रतिशत. मोबाइल पर इंटरनेट चलाने वालो में सोशल मीडिया चलाने वालों की संख्या 82 प्रतिशत है. आज चीन भारत के बाद फेसबुक की जनसंख्या सर्वाधिक है, ये आकड़ें अपने आप में सोशल मीडिया की लोकप्रियता को बता रहे थे.
सोशल मीडिया का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है कि इसने समाज में हर व्यक्ति को आवाज उठाने की ताकत दी है जो एक सशक्त लोकतांत्रिक राज्य की अनिवार्य आवश्यक्ता है, साथ ही शिक्षा जागरूकता के क्ष्ेात्र में काफी विकास किया है.

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हम दिनों दिन सोशल मीडिया की धार में कटते जा रहे है और आभासी विकास के चलते वास्तविकता का विनाश कर रहे है

इन सब अच्छी बातों के बावजूद सिक्के के दूसरे पहलू के रूप में यह भावनाओं के मामलों में घातक सिद्ध हुआ है. अर्थशास्त्र का नियम है बढ़ती मांग की कीमत चुकानी पड़ती है. फेसबुक, ट्वीटर से लोग समाज के करीब होने चले थे पर वे खुद से ही दूर होते जा रहे है. आज फेसबुक पर कोई भी लाइक करने से चूकता नहीं है, भले ही उसका उससे वास्ता हो या न हो. हर कोई इस आभासी दुनिया में डूब रहा है रिश्ते, प्यार और दोस्ती की खोज कर रहा है और इसके एवज में वह वास्तविक दुनिया से नाता तोड़ रहा है.
शक अविश्वास के कारण होता है और अक्सर यह रिश्तों में अपारदशर््िाता से पैदा होता है. सोशल मीडिया ने भले ही वैश्विक लोकतांत्रिकरण को बढावा दिया हो लेकिन यह बात भी सत्य है कि यह पारिवारिक द्वंद का कारण बनता जा रहा है. पति पत्नि के मधुर रिश्तों के बीच फेसबुक में किया गया लाइक दरार पैदा कर रहा है. हमारे घर परिवार के बच्चे बचपन में ही बड़े हो रहे है और हैरानी तब होती है जब साइबर कैफे में बच्चों को फेसबुक चलाते देखा जाता है. हाल ही में समाजसेवी गोविन्दाचार्य की याचिका पर सुनवायी करते हुए कोर्ट ने सेाशल मीडिया के नियामकों को इसके उपयोग करने की उम्र के संदर्भ में जबाव मांगा था और इस बारे में सरकार को स्पष्ट नीति बनाने को कहा था. आज के स्कूल जाने वाले बच्चे खेलने कूदने की उम्र में आभासी संसार का लुफ्त ले रहे है जिससे उनका स्वास्थ्य तो बाधित होता ही है साथ ही प्रकृति से उनका जुड़ाव भी कमता जा रहा है जो हमारे देश के भविष्य के संास्कृतिक पतन का कारण बनते जा रहा है जिसका परिणाम आने वाले दिनों में हमाने सामने होगा.
परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई होती है परिवार का माहौल समाज पर अपना प्रभाव डालता है जिस कारण आज पारिवारिक द्वंद सामाजिक मेलमिलाप को प्रभावित करता जा रहा है आज हम अपने बुर्जगों को तो आपस में गप्प मारते देख ले रहे है लेकिन आने वाले समय में ये भी नसीब नहीं होगा.
समाज में आत्महत्या, बलात्कार, जैसे कुकर्म करने वाला व्यक्ति इसे सही मानकर करता है वह जान ही नहीं पाता कि यह गलत है क्योंकि उसमें विचार करने, सही गलत की पहचान करने की क्षमता नहीं है. ऐसी क्षमताएं व्यक्ति में खुद सोचने विचारने से विकसित होती है. हम जब भी एकांत में होते है या अकेले बैठे होते है तुरन्त फेसबुक चलाने लगते है और ऐसा हमारी आदत में आ जाता है, जिससे आत्मंथन करने का वह महत्वपूर्ण समय हमारे जीवन से समाप्त होता जा रहा है.
चितंन मनन हमारे जीवन की योजना बनाते है हमारा हर फैसला मूलतः इसी से जुड़ा होता है़. हमें हमसे मिलाते है, अपनी अच्छाइयों बुराईयांे से परिचित कराते है. हमारी उम्मीदों, हौसलों, सपनों की कल्पना का आधार यही होता है.
इन बातों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिन्दगी में इनकी कितनी ज्यादा महत्ता है और हम दिनों दिन सोशल मीडिया की धार में इन्हे काटते जा रहे है और आभासी विकास के चलते वास्तविकता का विनाश कर रहे है, आवश्यक्ता है एक सम्यक संतुलित दृष्टिकोण की जो हमें नियत्रित तरीके से संचालन सिखाएगा. जो वक्त की जरूरत है.

            Imageयह सबक लेने का आखिरी मौका है अगली बार शायद ये मैाका भी न मिले
         विश्व बैंक की रिपोर्ट, जिसमें पर्यावरणीय प्रभावों से गहन आर्थिक क्षति का अनुमान लगाते हुए कहा है, कि इससे सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याएं भी बढ़ेगी. उत्तराखंड राज्य में 16 जून की रात और 17 की सुबह में प्रकृति का जो भयावह रूप दिखाया, जो गवाही देता है कि मानवीय हस्तक्षेप ने पर्यावरण का कितना नुकसान कर दिया है. इतने दिनों के बाद भी केदारनाथ में फंसे हजारों लोगों के लापता है और सैकड़ो की लाशेां से पहाड लाल है, जो हमारे अकुशल आपदा प्रबंधन और जोखिम सहन न कर पाने की क्षमता की बुरी हालत का बता रहे है.

पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 2010 में भारत के बारे में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का मूल्यांकन कराया था, जिसमें विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्र और तटवर्ती क्षेत्रों में पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर गंभीर चिन्ता प्रकट की गई है. इसके बावजूद कोई विशेष योजना नहीं बनाई गई. सुप्रीम कोर्ट ने 1991 में स्नातक पाठ्यक्रमों में पर्यावरण अध्ययन अनिवार्य करने की बात कही थी लेकिन दो दशक के बाद भी समान रूप से लागू नहीं है. और आज सरकार का इन विषयों पर गंभीरता नहीं दिखाना हमें तबाही के रूप में देखना पड़ रहा है. पर्यावरण की सुरक्षा एक दिन का काम नहीं है इसमंे समय लगता है.
आज हर कोई पहाड़ो की सैर करना चाहता है वह प्रकृति की अनूपम छटा को करीब से निहारना चाहता है. और साथ ही वह केदारनाथ जैसे पवित्र स्थान पर अपने उद्धार की कामना से तीर्थ करने की चाहत भी रखता है. हर साल महाशिवरात्री के समय कपाट खुलते से दीपावली में बन्द होने हजारों लोग यहां आते है. साढे तीन हजार से अधिक ऊचाई पर बसा यह दिव्य शक्ति पीठ बारह ज्योर्तिलिंगों में से एक है. पुराणांे के अनुसार पाण्डवों ने अज्ञातवास के दौरान यहां शिव की अर्चना की थी और 80 फीट की मूर्ति बनायी थी. पौरााणिक मंदिर का निर्माण आद्यग्ुारू शंकराचार्य ने कराया था, जिसका नाम बाद में सतयुग के राज केदार के नाम से रखा गया. मंदाकिनी नदी के तट पर बसा यह तीर्थ उत्तराखण्ड के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है. हर साल अप्रैल से नवम्बर के महीने में हजारों पर्यटक यहंा आते है और घटना की रात भी लगभग 8 हजार पर्यटक वहां थे. वहां से जान बचाकर जो लोग वापस लौटे है उनका कहना है कि हमने तबाही का ऐसा मंजर पहले कभी नहीं देखा. यह जीवन मिलिट्री वालों ने हमें दिया है जो मुस्तैदी से आपदा प्रबंधन में लगे है. प्राकृतिक आपदा के कारण गौरीकुण्ड़ से केदारनाथ जाने वाला 14 किलोमीटर पैदल मार्ग का नामों निशान मिट गया है जिस कारण पर्यटकों का वापस आने में असुविधा हो रही है. और सरकारी सहायता को भी उन तक पहुचाने में भी परेशानी हो रही है.
यह आपदा कोई पहली बार नहीं आयी. यह हर बार होता है और हर बार हम देखते ही रहते है कोसते ही रहते है. हजारों लोग मर जाते है सरकार उनके लिए अनुदान भेजती है, कुछ तक पहुचता है और कुछ तक नहीं भी, और कहानी यही खत्म हो जाती है. और फिर सारी बातें भुलाकर अगले साल भगवान के नाम पर या प्रकृति का आनंद लेने हजारों पर्यटक फिर आते है. लेकिन क्या कोई इस विकराल होती समस्या के कारणों की सतह में जाने का प्रयास करता है. शायद नहीं, अगर प्रयास कर रहा होता तो तबाही सालों साल भयानक न हो रही होती.
बात बहुत छोटी सी है, हमने घर के बाहर एक संाप देखा और डर के कारण उसे मार दिया कि कही वो हमे न नुकसान पहुचा दे. लेकिन क्या हमने ये सोचा कि आज हमने अपने डर से कितना नुकसान कर दिया. प्रकृति के खाद्य चक्र के महत्वपूर्ण चरण समाप्त कर दिया. बात इतनी ही नहीं है इससे इतर हर रोज न जाने कितने तरिकों से प्रदूषण फैलाते रहते है. अपने रोजमर्रा के क्रियाकलापों से घर के अन्दर से बाहर तक गन्दगी फैलाते है. कभी गलती से सड़क पर चलते हुए प्लास्टिक फेंकते है तो कभी सब कुछ जानते हुए भी गंगा यमुना जैसी पवित्र नदियों को सीवर के पानी से और अपने पाप धोने के बहाने अपवित्र करते है. आखिर कब यह रूढीवादी कर्म हमें सोचने को मजबूर करेगा. हां! शायद आपको इसका दुष्परिणाम तुरन्त पता न चले, लेकिन प्रकृति के साथ हुए इस अन्याय का असर हमे हर बदलते मौसम में देखने को मिलता ही रहता है. आज बाढ़ तो कल सूखा, कही गर्मी इतनी की लोग मर रहे है तो कड़ाके की ठण्ड भी बुरा हाल कर देती है.
हर आने वाला पर्यटक हो या क्ष्ेात्रीय लोग क्या कोई पर्यावरण के संरक्षण के लिए खुद कुछ कर रहा है? ये तो पता नहीे लेकिन इसके विपरित गर्मियों के इन देा चार महीनों में पर्यटकों द्वारा पहाड़ो को जमके गन्दा किया जाता है जितना बचे हुए साल में क्षेत्रीय लोग नहीं करते होगे. कहा गई हमारे कर्तव्य और पर्यावरण के प्रति हमारी जबावदेहीता. अभी तक के प्राप्त कारणों के आधार पर कहां भी जा रहा है कि केदारनाथ में बादल फटने में मंदिर परिसर के चारों ओर होता बेहिसाब निमार्ण है. पर्यटन के बढते व्यवसायीकरण के कारण प्रकृति की गोद में अपने ऐशो आराम के लिए प्रकृति के साथ छेड़छाड़ की जाती है. जो पर्यावरण प्रदूषण तो करता ही है साथ में सांस्कृतिक प्रदूषण को भी जन्म दे रहा है.
जरूरत आन पड़ी है कि पर्यावरण के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं. उन्हे स्त्रोत समझने के बजाय संसाधन के रूप में प्रयोग करें, अपने दायित्वों को जवाबदेही के साथ जोड़ने की आवश्कता है. अभी तक जलवायु संबधित नीतियां दुष्प्रभाव कम करने पर केंद्रित थी, किन्तु अब कमजोरी दूर करने और अनुकूलन दृष्टिकोण अपनाने पर रहेगी, जिससे जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों और आपदा जोखिम कम किया जा सकेगा.